Tuesday, December 25, 2012

ultimate goal of all is ...

The universal and the ultimate goal of all is to gain eternal and infinite happiness. God is of the nature of eternal and infinite happiness. Therefore, God is the ultimate goal of all. Keeping Him in mind, we should do all our worldly duti...es. This will always keep us on the righteous path.

Also, success comes only when our efforts are focused towards achieving a goal. Therefore, setting of right goals is very important. Our goals should be noble and inspiring. Michelangelo said that the tragedy of human beings is not that they do not achieve the high goals that they set, but that they set very low goals and achieve them!
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अर्जुन की प्रतिज्ञा...

अर्जुन की प्रतिज्ञा
महाभारत का भयंकर युद्ध चल रहा था। लड़ते-लड़के अर्जुन रणक्षेत्र से दूर चले गए थे। अर्जुन की अनुपस्थिति में पाण्डवों को पराजित करने के लिए द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उ...समें घुस गया।

उसने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए, लेकिन सातवें चरण में उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया और उस पर टूट पड़े। जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर जोरदार प्रहार किया। वह वार इतना तीव्र था कि अभिमन्यु उसे सहन नहीं कर सका और वीरगति को प्राप्त हो गया।

अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा। उसने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा। जयद्रथ भयभीत होकर दुर्योधन के पास पहुँचा और अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में बताया।

दुर्य़ोधन उसका भय दूर करते हुए बोला-“चिंता मत करो, मित्र! मैं और सारी कौरव सेना तुम्हारी रक्षा करेंगे। अर्जुन कल तुम तक नहीं पहुँच पाएगा। उसे आत्मदाह करना पड़ेगा।” अगले दिन युद्ध शुरू हुआ।

अर्जुन की आँखें जयद्रथ को ढूँढ रही थीं, किंतु वह कहीं नहीं मिला। दिन बीतने लगा। धीरे-धीरे अर्जुन की निराशा बढ़ती गई। यह देख श्रीकृष्ण बोले-“पार्थ! समय बीत रहा है और कौरव सेना ने जयद्रथ को रक्षा कवच में घेर रखा है। अतः तुम शीघ्रता से कौरव सेना का संहार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो।”

यह सुनकर अर्जुन का उत्साह बढ़ा और वह जोश से लड़ने लगे। लेकिन जयद्रथ तक पहुँचना मुश्किल था। संध्या होने वाली थी। तब श्रीकृष्ण ने अपनी माया फैला दी। इसके फलस्वरूप सूर्य बादलों में छिप गया और संध्या का भ्रम उत्पन्न हो गया। ‘संध्या हो गई है और अब अर्जुन को प्रतिज्ञावश आत्मदाह करना होगा।’-यह सोचकर जयद्रथ और दुर्योधन खुशी से उछल पड़े। अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा।

जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले-“पार्थ! तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। वह देखो अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है।” यह कहकर उन्होंने अपनी माया समेट ली। देखते-ही-देखते सूर्य बादलों से निकल आया। सबकी दृष्टि आसमान की ओर उठ गई। सूर्य अभी भी चमक रहा था।

यह देख जयद्रथ और दुर्योधन के पैरों तले जमीन खिसक गई। जयद्रथ भागने को हुआ लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया था।

तभी श्रीकृष्ण चेतावनी देते हुए बोले-“हे अर्जुन! जयद्रथ के पिता ने इसे वरदान दिया था कि जो इसका मस्तक जमीन पर गिराएगा, उसका मस्तक भी सौ टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा। इसलिए यदि इसका सिर ज़मीन पर गिरा तो तुम्हारे सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएँगे। हे पार्थ! उत्तर दिशा में यहाँ से सो योजन की दूरी पर जयद्रथ का पिता तप कर रहा है। तुम इसका मस्तक ऐसे काटो कि वह इसके पिता की गोद में जाकर गिरे।”

अर्जुन ने श्रीकृष्ण की चेतावनी ध्यान से सुनी और अपनी लक्ष्य की ओर ध्यान कर बाण छोड़ दिया। उस बाण ने जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और उसे लेकर सीधा जयद्रथ के पिता की गोद में जाकर गिरा। जयद्रथ का पिता चौंककर उठा तो उसकी गोद में से सिर ज़मीन पर गिर गया। सिर के जमीन पर गिरते ही उनके सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई।
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श्री कृष्ण चालीसा ...

श्री कृष्ण चालीसा - जय हो श्री कृष्ण जी.
।। दोहा ।।
बंशी शोभित कर मधुर, नील जल्द तनु श्यामल ।
अरुण अधर जनु बिम्बा फल, नयन कमल अभिराम ।।
पुरनिंदु अरविन्द मुख, पिताम्बर शुभा साज्ल ।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचंद्र महाराज ।।
...

जय यदुनंदन जय जगवंदन l
जय वासुदेव देवकी नंदन ।।
जय यशोदा सुत नन्द दुलारे l
जय प्रभु भक्तन के रखवारे ।।
जय नटनागर नाग नथैया l
कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया ।।
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो l
आओ दीनन कष्ट निवारो ।।
बंसी मधुर अधर धरी तेरी l
होवे पूरण मनोरथ मेरी ।।
आओ हरी पुनि माखन चाखो l
आज लाज भक्तन की राखो ।।
गोल कपोल चिबुक अरुनारे l
मृदुल मुस्कान मोहिनी डारे ।।
रंजित राजिव नयन विशाला l
मोर मुकुट वैजयंती माला ।।
कुंडल श्रवण पीतपट आछे l
कटी किंकिनी काछन काछे ।।
नील जलज सुंदर तनु सोहे l
छवि लखी सुर नर मुनि मन मोहे ।।
मस्तक तिलक अलक घुंघराले l
आओ श्याम बांसुरी वाले ।।
करि पी पान, पुतनाहीं तारयो l
अका बका कागा सुर मारयो ।।
मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला l
भये शीतल, लखिताहीं नंदलाला ।।
सुरपति जब ब्रिज चढ़यो रिसाई l
मूसर धार बारि बरसाई ।।
लगत-लगत ब्रिज चाहं बहायो l
गोवर्धन नखधारी बचायो ।।
लखी यशोदा मन भ्रम अधिकाई l
मुख महँ चौदह भुवन दिखाई ।।
दुष्ट कंस अति ऊधम मचायो l
कोटि कमल कहाँ फूल मंगायो ।।
नाथी कालियहिं तब तुम लीन्हें l
चरनचिंह दै निर्भय किन्हें ।।
करी गोपिन संग रास विलासा l
सब की पूरण करी अभिलाषा ।।
केतिक महा असुर संहारयो l
कंसहि केश पकडी दी मारयो ।।
मातु पिता की बंदी छुडाई l
उग्रसेन कहाँ राज दिलाई ।।
माहि से मृतक छहों सुत लायो l
मातु देवकी शोक मिटायो ।।
भोमासुर मुर दैत्य संहारी l
लाये शत्दश सहस कुमारी ।।
दी भिन्हीं त्रिन्चीर संहारा l
जरासिंधु राक्षस कहां मारा ।।
असुर वृकासुर आदिक मारयो l
भक्तन के तब कष्ट निवारियो ।।
दीन सुदामा के दुःख तारयो l
तंदुल तीन मुठी मुख डारयो ।।
प्रेम के साग विदुर घर मांगे l
दुर्योधन के मेवा त्यागे ।।
लाखी प्रेमकी महिमा भारी l
नौमी श्याम दीनन हितकारी ।।
मारथ के पार्थ रथ हांकेl
लिए चक्र कर नहीं बल थाके ।।
निज गीता के ज्ञान सुनाये l
भक्तन ह्रदय सुधा बरसाए ।।
मीरा थी ऐसी मतवाली l
विष पी गई बजाकर ताली ।।
राणा भेजा सांप पिटारी l
शालिग्राम बने बनवारी ।।
निज माया तुम विधिहीन दिखायो l
उरते संशय सकल मिटायो ।।
तव शत निंदा करी ततकाला l
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ।।
जबहीं द्रौपदी तेर लगाई l
दीनानाथ लाज अब जाई ।।
अस अनाथ के नाथ कन्हैया l
डूबत भंवर बचावत नैया ।।
सुन्दरदास आस उर धारी l
दयादृष्टि कीजे बनवारी ।।
नाथ सकल मम कुमति निवारो l
छमोबेग अपराध हमारो ।।
खोलो पट अब दर्शन दीजे l
बोलो कृष्ण कन्हैया की जय ।।


।। दोहा ।।
यह चालीसा कृष्ण का, पथ करै उर धारी ।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि फल, लहे पदार्थ चारी ।।

जैसी करनी वैसा फल ...

जैसी करनी वैसा फल
आज नहीं तो निश्चित कल !
जब तक कर्म कर्ता को पकड़ नहीं लेता तब तक पीछा नहीं छोड़ता ! यह क्रम जन्मों जन्मों तक चलता रहता है ! आप सब राम नाम जपते हो इसलिये कि नामी विचारों में बस जाए ! विचारों के अनुसार ही कर्म होते हैं !... यही सोचो कि हमारे कर्म श्रेष्ठ हों ,सत्कर्म हों ! हमें सद्गति मिले ! कर्म रावण जैसे करो और फल चाहो राम जैसा यह सम्भव नहीं ! जब कर्म हो चुका तब कुछ नहीं होगा ! कर्म करने से पहले सोचो ! एक दफा़ तीर निकल गया तो कहीं न कहीं तो लगेगा ही ! यह सब कुकर्म करने से पहले सोचना था !

Krishna Govinda Govinda...

Krishna Govinda Govinda
Krishna Govinda Govinda, Gopal Nandalaal
Radhe Govinda Govinda, Gopal Nandalaal

Mero Yashodakolaal, Mero Yashodakolaal
Yashodakolaal Mero Yashodakolaal
... Mero Nandajikolaal, Mero Nandajikolaal
Nandajikolaal Mero Nandajikolaal
Krishna Govinda Govinda, Gopal Nandalaal
Radhe Govinda Govinda, Gopal Nandalaal

Mero Chotoso Gopal, Mero Chotoso Gopal
Chotoso Gopal Mero Chotoso Gopal
Mero Madana Gopal, Mero Madana Gopal
Madana Gopal Mero Madana Gopal
Krishna Govinda Govinda, Gopal Nandalaal
Radhe Govinda Govinda, Gopal Nandalaal

Mero Radha Vallabh Laal, Mero Radha Vallabh Laal
Radha Vallabh Laal Mero Radha Vallabh Laal
Mero Kunja Bihari Laal, Mero Kunja Bihari Laal
Kunja Bihari Laal Mero Kunja Bihari Laal
Krishna Govinda Govinda, Gopal Nandalaal
Radhe Govinda Govinda, Gopal Nandalaal
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संसार में दो ही पदार्थ हैं...

|| कार्य - कारण विवेचन ||
संसार में दो ही पदार्थ हैं - जड और चेतन | पुरुष चेतन है , प्रकृति जड है | पुरुष द्रष्टा है , प्रकृति दृश्य है | पुरुष निर्विकार है , प्रकृति विकारशीला है | इनमें देखने वाला द्रष्टा है और दूसरा जगत रूप में दीखनेवाल...ा दृश्य है | गीता [ श्लोक १३ / २० ] में ' कार्य और कारण के उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही गई है |' पांच भूत [ आकाश , वायु , अग्नि , जल और पृथ्वी ] तथा पांच विषय [ शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गंध ] इन दस का नाम ' कार्य ' है | पांच ज्ञानेन्द्रियाँ [ कान , नाक , आँख , जीभ और त्वचा ] ; पांच कर्मेन्द्रियाँ [ वाणी ,हाथ , पाँव , उपस्थ और गुदा ] तथा मन , बुद्धि , और अहंकार - इन तेरह का नाम करण है | प्रकृति इन सबका कारण है | अत: प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण यह सारा जगत प्रकृति का ही स्वरूप है | प्रकृति पुरुष का अंश नहीं है , वह उसकी शक्ति है | शक्ति भी शक्तिमान से कभी अलग नहीं हो सकती |
जब महाप्रलय होता है , उस समय सारा दृश्य - जगत प्रकृति में समा जाता है | उस समय केवल प्रकृति ही रहती है | जो उसका अव्यक्तरूप है | व्यक्तरूप का उत्पत्तिक्रम इस प्रकार है - मूल प्रकृति से समष्टि - बुद्धि उत्पन्न हुई | समष्टि बुद्धि से समष्टि - अहंकार और समष्टि अहंकार से समष्टि मन की उत्पत्ति होती है | उसी अहंकार से पांच विषय [ शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गंध ] की उत्पत्ति हुई | वास्तव में मन , बुद्धि , अहंकार - ये तीनों एक ही अंत:करण की विभिन्न अवस्था के तीन नाम हैं | इन पाँचों सूक्ष्मभूतों से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ , पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच महाभूतों की उत्पत्ति होती है | यही दृश्य - जगत है | इसका कारण प्रकृति है | यह अनिर्वचनीय है , जो तो कारण ही है , किन्तु पुरुष - ईश्वर महाकारण है | उसीसे यह संसार धारण किया गया है |
वस्तुत: यह पुरुष सृष्टि का उपादान और निमित्त दोनों ही कारण है | भगवान ने गीता [ श्लोक ४ / १३ ] में कहा है की ' ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य आदि चार वर्णों का समूह गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है |' यहाँ भगवान ने अपने को निमित्त - कारण बतलाया है ; किन्तु गीता [ श्लोक ९ / १० ] में उन्होंने प्रकृति को निमित्त - कारण बताया है | विचार करने पर यही सिद्ध होता है की ज्ञान और भक्ति दोनों ही सिद्धांतों से उपादान कारण भी ईश्वर ही है | परन्तु गीता [ श्लोक ४ / १३ ] में भगवान कहते हैं की ' उस चातुर्वर्ण्य के रचयिता होते हुए भी मुझ अविनाशी को तू अकर्त्ता ही समझ |' गीता [ श्लोक १३ /२२ ] में ' इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है |' इस चराचर जगत के सहित जो परमात्मा का स्वरूप है , वह सगुण है ; इससे अतीत जहां चराचर संसार नहीं है , जो केवल है , वह गुणातीत है | जैसे पृथ्वी के दो भेद हैं - गंध निराकार है और पुष्प साकार है ; अग्नि अप्रकट रूप में निराकार और प्रकट रूप में साकार है ; जल परमाणु रूप में निराकार तथा बादल , बूँद , और ओले के रूप में साकार है , वैसे ही सर्वव्यापी सगुण परमात्मा निराकार रूप में रहते हुए ही , साकार रूप से भी प्रकट होते हैं | इसी बात को भगवान ने गीता [ श्लोक ७ / ३० ] में कहा है | इसीका नाम समग्र ब्रह्म है , यही पुरुषोत्तम है |
जीवात्मा उपासक है और परमात्मा उपास्य है | सभी सिद्धांतों के अनुसार आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होने के उपरान्त ' केवल्य ' अवस्था हो जाती है | यानी फिर कार्य सहित इस प्रकृति के साथ कुछ भी संबंध नहीं रहता | ज्ञान और कर्मयोग कहते हैं की आत्मज्ञान के बाद प्रकृति है तो सही , पर जिसको आत्मा का साक्षात्कार हो गया है , उसका प्रकृति से कोई संबंध नहीं रहता ( उसके लिए प्रकृति सांत ( स-अंत ) हो जाती है ) |
|| इति ||
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धीर पुरुष मोहित नहीं होता ...

As It Is 2.13
Dehino ’smin yatha dehe kaumaram yauvanam jara
tatha dehantara-praptir dhiras tatra na muhyati

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
... TRANSLATION : As the embodied soul continuously passes, in this body, from boyhood to youth to old age, the soul similarly passes into another body at death. A sober person is not bewildered by such a change.
भावार्थ : जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता ॥