The universal and the ultimate goal of all is to gain eternal and infinite happiness. God is of the nature of eternal and infinite happiness. Therefore, God is the ultimate goal of all. Keeping Him in mind, we should do all our worldly duti...es. This will always keep us on the righteous path.
Also, success comes only when our efforts are focused towards achieving a goal. Therefore, setting of right goals is very important. Our goals should be noble and inspiring. Michelangelo said that the tragedy of human beings is not that they do not achieve the high goals that they set, but that they set very low goals and achieve them!See More
Also, success comes only when our efforts are focused towards achieving a goal. Therefore, setting of right goals is very important. Our goals should be noble and inspiring. Michelangelo said that the tragedy of human beings is not that they do not achieve the high goals that they set, but that they set very low goals and achieve them!See More





![Photo: || कार्य - कारण विवेचन ||
संसार में दो ही पदार्थ हैं - जड और चेतन | पुरुष चेतन है , प्रकृति जड है | पुरुष द्रष्टा है , प्रकृति दृश्य है | पुरुष निर्विकार है , प्रकृति विकारशीला है | इनमें देखने वाला द्रष्टा है और दूसरा जगत रूप में दीखनेवाला दृश्य है | गीता [ श्लोक १३ / २० ] में ' कार्य और कारण के उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही गई है |' पांच भूत [ आकाश , वायु , अग्नि , जल और पृथ्वी ] तथा पांच विषय [ शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गंध ] इन दस का नाम ' कार्य ' है | पांच ज्ञानेन्द्रियाँ [ कान , नाक , आँख , जीभ और त्वचा ] ; पांच कर्मेन्द्रियाँ [ वाणी ,हाथ , पाँव , उपस्थ और गुदा ] तथा मन , बुद्धि , और अहंकार - इन तेरह का नाम करण है | प्रकृति इन सबका कारण है | अत: प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण यह सारा जगत प्रकृति का ही स्वरूप है | प्रकृति पुरुष का अंश नहीं है , वह उसकी शक्ति है | शक्ति भी शक्तिमान से कभी अलग नहीं हो सकती |
जब महाप्रलय होता है , उस समय सारा दृश्य - जगत प्रकृति में समा जाता है | उस समय केवल प्रकृति ही रहती है | जो उसका अव्यक्तरूप है | व्यक्तरूप का उत्पत्तिक्रम इस प्रकार है - मूल प्रकृति से समष्टि - बुद्धि उत्पन्न हुई | समष्टि बुद्धि से समष्टि - अहंकार और समष्टि अहंकार से समष्टि मन की उत्पत्ति होती है | उसी अहंकार से पांच विषय [ शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गंध ] की उत्पत्ति हुई | वास्तव में मन , बुद्धि , अहंकार - ये तीनों एक ही अंत:करण की विभिन्न अवस्था के तीन नाम हैं | इन पाँचों सूक्ष्मभूतों से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ , पांच कर्मेन्द्रियाँ और पांच महाभूतों की उत्पत्ति होती है | यही दृश्य - जगत है | इसका कारण प्रकृति है | यह अनिर्वचनीय है , जो तो कारण ही है , किन्तु पुरुष - ईश्वर महाकारण है | उसीसे यह संसार धारण किया गया है |
वस्तुत: यह पुरुष सृष्टि का उपादान और निमित्त दोनों ही कारण है | भगवान ने गीता [ श्लोक ४ / १३ ] में कहा है की ' ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य आदि चार वर्णों का समूह गुण और कर्मों के विभागपूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है |' यहाँ भगवान ने अपने को निमित्त - कारण बतलाया है ; किन्तु गीता [ श्लोक ९ / १० ] में उन्होंने प्रकृति को निमित्त - कारण बताया है | विचार करने पर यही सिद्ध होता है की ज्ञान और भक्ति दोनों ही सिद्धांतों से उपादान कारण भी ईश्वर ही है | परन्तु गीता [ श्लोक ४ / १३ ] में भगवान कहते हैं की ' उस चातुर्वर्ण्य के रचयिता होते हुए भी मुझ अविनाशी को तू अकर्त्ता ही समझ |' गीता [ श्लोक १३ /२२ ] में ' इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है |' इस चराचर जगत के सहित जो परमात्मा का स्वरूप है , वह सगुण है ; इससे अतीत जहां चराचर संसार नहीं है , जो केवल है , वह गुणातीत है | जैसे पृथ्वी के दो भेद हैं - गंध निराकार है और पुष्प साकार है ; अग्नि अप्रकट रूप में निराकार और प्रकट रूप में साकार है ; जल परमाणु रूप में निराकार तथा बादल , बूँद , और ओले के रूप में साकार है , वैसे ही सर्वव्यापी सगुण परमात्मा निराकार रूप में रहते हुए ही , साकार रूप से भी प्रकट होते हैं | इसी बात को भगवान ने गीता [ श्लोक ७ / ३० ] में कहा है | इसीका नाम समग्र ब्रह्म है , यही पुरुषोत्तम है |
जीवात्मा उपासक है और परमात्मा उपास्य है | सभी सिद्धांतों के अनुसार आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होने के उपरान्त ' केवल्य ' अवस्था हो जाती है | यानी फिर कार्य सहित इस प्रकृति के साथ कुछ भी संबंध नहीं रहता | ज्ञान और कर्मयोग कहते हैं की आत्मज्ञान के बाद प्रकृति है तो सही , पर जिसको आत्मा का साक्षात्कार हो गया है , उसका प्रकृति से कोई संबंध नहीं रहता ( उसके लिए प्रकृति सांत ( स-अंत ) हो जाती है ) |
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